मेरी कविताएं... लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मेरी कविताएं... लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 17 फ़रवरी 2016

मौसम हुआ अमलताश.....


सुलगती दोपहरों में....
सोने की चमक....
के साथ...
नीले धुले आसमान की छाती पर 
खिल उठा मौसम.....
अमलताश.....अमलताश....
लो, फिर आ गया वसंत.....

अनुजा
10.05.14

मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

उम्‍मीद का छोर और वसंत____

छोड़ना मत तुम उम्‍मीद...
एक दिन
बादल का एक छोर पकड़कर
वासन्‍ती फूलों की महक में लिपट...
धरती गायेगी
वसन्‍त का गीत....

सब दु:ख...
सारे भय...
सब आतंक...
सारी असफलताएं ......
सारा आक्रोश

पिघलकर बह जाएगा
सूरज के सोने के साथ....

ओढ़ लेंगी सब दिशाएं
गुलाबी बादलों की चूनर....
मौसम गायेगा
रंग के गीत....

और
तुम्‍हारे सर पर होगा
एक सायबान....
पिरियाई सरसों
के बिछौने पर
आसमानी दुपट्टे
को ओढ़
सो जाना तुम अपने
प्रेम की किताब को
रखकर सिरहाने....

कोई पंछी छेड़ देगा
सुरीली लोरी की तान....
बर्फीले पहाड़ों से
आएगी एक परी....
जादू की एक छड़ी के साथ....
श्रम सीकरों का ताप सोख
आंखों में भर देगी कोई एक
मधुर स्‍वप्‍न....

हारना मत तुम....
चलते रहना....
थाम कर उम्‍मीद का छोर....

अनुजा
04.02.14


गुरुवार, 16 जनवरी 2014

स्‍वामी का अधिकार नहीं है तुम्‍हें.....

मेरी इस अस्मिता से सहम क्यों जाते हो तुम
मानव होने के मेरे उद्घोष को
पचा क्यों नहीं पाते तुम
तुम्हें पता है कि
इसके बाद वस्तु नहीं रह जाउंगी मैं
जिसे तुम इस्तेमाल करो और फेंक दो
तुम्हें पता है कि तकिया भर नहीं रह जाउंगी मैं
जिसकी छाती में मुहं छिपाकर रो लो तुम
और फिर लतिया दो
तुम्हें पता है फूल नहीं रह जाउंगी फिर मैं
कि मुझे रसशून्य करके हो जाओ रससिक्‍त तुम
और मुझे रौंद दो
तुम्हें पता है कि तुम्हारे प्रदीप्त अहं की तुष्टि का सामान भर नहीं
रह जाउंगी मैं
जिसके आंसुओं से प्रज्ज्वलित हो सके तुम्हारा दर्प।

तुम भूल गए कि मैं जननी हूं
तुम्हें  मैंने ही जन्म दिया है
मुझे अधिकार का दान देने वाले तुम कौन
याचक नहीं हैं मेरे अधिकार
असिमता सम्मान और उपस्थिति का बोध हैं
तुमने छला मुझे
मेरे ही खिलाफ मेरे लिए तुमने
लक्ष्मण रेखाएं खींचीं
और मुझे जिन्दा झोंक दिया दहकती अग्नि में
अपनी शुचिता और न्याय के नाम पर
तुमने मुझे अशुच और अपराधी साबित किया
तुमने किताबें रची
नियम बनाए
मेरी पहचान को मिटाकर अपनी सत्ता बनायी
और आज तुम
मेरे सृष्टा और नियन्ता होने के गर्व तले
मेरे होने को भी
खत्म करने पर आमादा हो.....

नहीं ये नहीं हो सकता
तुम सहचर हो सकते हो
मित्र हो सकते हो
साथी हो सकते हो
सखा हो सकते हो
आसक्‍त प्रणयी हो सकते हो
आहत प्रेमी हो सकते हो
स्वामी का अधिकार नहीं है तुम्हें...।

- अनुजा
  2007

बुधवार, 15 जनवरी 2014

इंसान हूं मैं....

मैं क्या हूं.....

सूरज की एक किरन
फूल की एक पंखुड़ी
ओस की एक बूंद
हवा में उड़ता कोई आवारा पत्ता
आंधी का एक झोंका
आग की एक लपट
या
जीवन की एक धड़कन
मुझे आज कुछ भी नहीं पता अपना
अपने आप से अनजान मैं
अपनी ही तलाश में हूं इस सफर में

मैं अग्निशिखा अमृता
अब किसी अग्निपरीक्षा के लिए नहीं हूं
मैं न काली हूं
न दुर्गा
न गौरी
न भैरवी
न मैं याज्ञसेनी हूं
न गार्गी मैत्रेयी
न कात्यायनी
मैं इंसान हूं।

-अनुजा
2007


रविवार, 12 जनवरी 2014

तुम्‍हारे लिए....

न.....।
बीते दिनों से लौटने को मत कहो.....
उनकी यादों को संजो लो....
समय ने बहुत सी सीपियां....
सीपियों में मोती
तुम्‍हारे लिये छुपा रखे हैं....
अपनी हथेलियों में.....
उन्‍हें खोजो.....
समेटने को  हथेलियां खोल दो.....।

अनुजा....
12.01.14

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

तलाश.....

सूखे पत्तों की खरकन के बीच
तलाश
एक कोंपल की...
एक चिनगी की...
एक नर्म कली की...
एक बूंद ओस की...
चुटकी भर आस की...
एक गुलमोहरी सपने की...
अंजुरी भर चांदनी की...
कुछ ज़्यादा तो नहीं ना !
जीवन सा
सपने सा
या फिर
टूटती उम्मीद सा...!

अनुजा
08.07.07

गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

पांचवा रास्‍ता..

समय बदलता है तो
बदल जाता है बहुत कुछ.....

ख़्याल उगते हैं तो
रच जाती है एक दुनिया.....।

यादों पर जमी हुई धूल की परतें साफ होने लगी हैं...
गिरहें खुलने लगी हैं......

नज़र आने लगी है एक पगडंडी सी
जो ले जाएगी उस मोड़ तक.....

जहां से शुरू होगा
कोई एक पांचवां रास्ता......।

अनुजा
02.09.13

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

हथेलियों में....


जब कुछ नहीं होता
तो बहुत कुछ होता है
हथेलियों में.....

ख्‍वाहिशें....
सपने....
उम्‍मीदें....
आसरे....
यक़ीन...                   

मेरा-तुम्‍हारा....

यादें....
तुम और मैं....

एक कप चाय
के बीच
बहती गुफ्तगुएं.....
लंबी यात्राएं.....

बादलों के बीच खोते रास्‍ते.....
एक रूमानी निश्चिन्‍तता.....

हवाओं के झोंके....
सूखे पत्‍तों से भरे रास्‍ते...

नीला शामियाना....
सुर्ख़ पीला सफेद बल्‍ब
उजियाली सुबहें
सर्द सफेद रातें....
सन्‍नाटे जंगल....
पैरों की थाप....

टहनी पर अटकी कलियां
दानों पर गिरती चिडि़या....

एक खामोशी.....
कुल आवाज़ें.....

जि़न्‍दगी से बात
सारी उजास....
उदासी की शाम...
आवारगी की रात.....
भोर की बात.....
मौजों के साहिल....
शफ्फाक झरने....
एक मौज
एक साहिल.....
एक चांद और ढेर से सितारे.....

बहुत कुछ होता है...
जब कुछ नहीं होता
ह‍थेलियों में.....।
अनुजा
14.09.13
फोटो:आर.सुन्‍दर(c)

रविवार, 6 अक्तूबर 2013

सन्‍नाटा....

फोटो: आर.सुन्‍दर (C)
तुमने
ये कैसा सन्नाटा बोया है.......
चारों तरफ
बस धुंधलाती दिशाएं हैं
और टूटकर बिखरते फूल.....
तुमने ये कैसा सन्नाटा खींचा है.....
कि कैनवास की रेत पर रुकता ही नहीं कोर्इ रंग......
तुमने ये कैसा सन्नाटा बोला है.......
सन्नाटा...!
जिसमें गूंजता है बस
खामोशी का एक लम्हा
और
चुप्पी का एक मौसम.......!

कितनी भारी है ये खामोशी
उन आंधियों से.....
जब
टूटती थीं शिलाएं......
और
भागते थे दरिया......
बस अपनी ही रौ में.....
दौड़ती थीं लहरें
पांवों को छूने
और छूकर लौट जाने के लिए......
रेत के लहराते सपनों पर
रचा है तुमने
ये कैसा सन्नाटा........!

यहां न सितारे हैं.....
न चांद...
न निरभ्र आकाश.....
ना बादलों का ओर छोर छूते
चहचहाते पंछी.....
बस एक चमकीली नीलिमा
के साये तले
बिखरी हुर्इ उजड़ी सी हरीतिमा के आगोश में......

छीजता है एक गहरा सन्नाटा........!


अनुजा
23.04.07

सांप्रदायिकता, राजनीति और हम....


हमने जब सफ़र शुरू किया था.....
गहरे दोस्त थे.........

आज
मैं तुम्हारे लिए एक हिन्दू भर कैसे रह गयी......
तुम आज दोस्ती के चोले को छोड़
केवल
मुसलमान कैसे रह गयीं........?

अपनी जि़दों और ज़दों के कटघरे में कै़द हो
तुमने ना सिर्फ मेरे भगवान को छोड़ा
बल्कि
अपने ख़ुदा को भी मुझसे जुदा कर दिया.....
जिसे
मैंने पुकारा हर बार उसी शिद्दत से अपने भगवान के साथ....
जिससे
मांगी हर बार तुमने दुआ
मेरे ही लिए......

तुमने  आज उस ख़ुदा का भी बंटवारा कर दिया.......

तुम आज उनके पाले में कैसे हो
जो
मुझे तुम्हें बांटकर अपनी सत्ता की सीमाओं को और बड़ा करना चाहते हैं......

तुम,
जो उनकी गलतियों से क्षुब्ध और भयभीत हो.....
आज उनकी गलतियों को दोहरा रही हो.....
यानि कि वो अपने मकसद में कामयाब रहे.....
और हम
नाकामयाब मोहब्बत के दर्द के साथ तन्हा हो गए........!

हमें तो यह लड़ार्इ फिर से लड़नी पड़ेगी....
किसी नर्इ रणनीति के साथ......
क्योंकि
अब यह लड़ार्इ केवल दुश्‍मनों से नहीं है
उन दोस्तों से भी है
जो
आज हमारे दुश्‍मनों के साथ खड़े हैं......!

10.05.07
अनुजा

सांप्रदायिकता, राजनीति और हम....-1

(1)
तुम्हारी
ये दलील उनकी जीत है.......
तुम्हारा
मुझे कटघरे में खड़ा करना
उनकी जीत है......
तुम्हारा
मुझ पर उंगली उठाना
उनकी जीत है.....


(2)

बरसों बीत गए......
हम मिले.....
दोस्त बने.......
हमने
अपने सुख दु:ख बांटे.....
अपना प्यार बांटा....
राज़दार बने एक दूसरे के ......
बरसों
हमने एक दूसरे को बड़े भावपूर्ण ख़त लिखे.......
एक दूसरे को भूल जाने के उलाहने दिए.....
एक दूसरे से रूठे और मनाए......

और आज !
आज तुमने उनकी साजि़श को कामयाब कर दिया......
तुमने
मुझे बेगाना करके
उनकी हर चाल को कामयाब कर दिया.....

तुमने !
जो हर सदी में उस वक्त मेरे साथ दिखी
जब सबने मेरा साथ छोड़ दिया........
जब मुझे उसकी ज़रूरत थी......
तुमने आज
मुझे बेसहारा और अकेला कर दिया......

राजनीति और सत्ता की लड़ार्इ में
मेरी आस्थाओं को चुनौती देकर
तुमने
आज मुझे इस नृशंस भीड़ में असहाय छोड़ दिया....

मैं सोचती थी कि
जब तक तुम मेरे साथ हो
उनकी कोर्इ चाल कामयाब नहीं हो सकती.......!
पर
आज मैं विश्वास, विकास और प्रयास की लड़ार्इ को हार गयी......!

तुम
मुझे छोड़कर उनके पक्ष में कैसे हो गर्इं
जो
मुझे और तुम्हें बरसों से अलग करने की कोशि श कर रहे हैं.......
और
हमारा प्यार उन्हें हमेशा पटखनी देता रहा.....!

तुमने
इतिहास, संस्कृति, समय, इंसानियत और प्रेम सबको नकारते हुए
उनको चुन लिया
जो
हमारे प्यार की मौत
और
तुममें रगे जां तक भर दिए गए भय और असुरक्षा की नींव पर ,
अपनी सत्ता की मीनार खड़ी करना चाहते हैं.....

तुमने ऐसा क्यों किया.....?

(3)

यों मत जाओ तुम....
रुको...ठहरो.....
कि
मैं तुम्हारे साथ हूं.......
कोर्इ ख़ुदा
या
कोर्इ भगवान
चाहे वो कितने ही रूपों में आए
या अरूप.....
क्या हमारे प्यार और विश्‍वास से बड़ा है ?
कोर्इ हिजाब या बेहिजाब संस्कृति.....
क्या उसकी उम्र हमारे साथ से बड़ी है ?
मैं तो ऐसा नहीं सोचती.....
और तुम?

अनुजा
8.5.07


रविवार, 22 सितंबर 2013

बिटिया....

बहुत पुरानी 1997 की एक कविता....तब बिटिया दिवस होता था या नहीं....याद नहीं पर घटनाएं तब भी यूं ही होती थीं...दहेज, बलात्‍कार, भ्रूण हत्‍या, बेटियों को नकार...विवाह का बोझ और भी जाने क्‍या क्‍या...जो पितृसत्‍ता की देन है...और साथ ही यह ताना भी अपना पल्‍ला झाड़ने के लिए कि औरत की सबसे बड़ी दुश्‍मन औरत ही होती है....क्‍यों.....इसकी पड़ताल किए बिना....बार-बार, लगातार.... । बाद में ये उस समय की साहित्यिक पत्रिका 'उत्‍तर प्रदेश' के नारी विशेषांक में भी छपी....। हालांकि स्‍त्री के पक्ष में बात करने वालों ने इसे पढ़ने के बाद यही प्रतिक्रिया की कि मैं ऐसा क्‍यों लिखती हूं..., सोचती हूं...कहती हूं कि बिटिया को जन्‍मना ही नहीं चाहिए, मुझे कहना चाहिए कि बिटिया को जनमना चाहिए, उसे अपने अधिकार भी हासिल करने चाहिए और इसके लिए लड़ाई जारी है...। कविता से शायद उन्‍हें एक दु:ख और बेबसी का आभास हुआ था....।

हां था...। शादी की उम्र में बार बार यह सुनना कि शादी कर लो, सब मिलेगा....,उनसे, जो जानते थे कि बिटिया क्‍या चाहती है...। पता है कि वो भी बेबस थे....बिटिया से बुढि़या बनी वह औरत....जो आज नहीं है...मगर जिसकी किताब में शायद यह था ही नहीं कि बिटिया को बिना ब्‍याहे भी सब कुछ दिया जा सकता है....सब कुछ...., जिसके एलबम में पति के बिना कोई तस्‍वीर होती ही नहीं है...क्‍या है जो वह उसे एक थप्‍पड़ मार भी देता है....,जिसके जीवन की शुरूआत और अंत बिटिया से ही होती है...जो यशोदा सी थी...और जिसे बिटियों से सबसे ज्‍़यादा प्रेम था....‍जो बेटों और बेटियों में से बिटिया को ही चुनती थी सब देने के लिए....हां, उसकी हसरतों के निषेध की प्रतिक्रिया में ही जन्‍मी थी यह रचना.....न जाने ऐसी कितनी बेटियों के लिए...जो बूढ़ी हो गयीं हैं...जानती हैं, मानती हैं....पर स्‍वीकार नहीं कर पाती हैं स्‍त्री का अकेला पूर्ण स्‍वरूप....। तो बेटी के विवाह की ये कामना पितृसत्‍ता से उपजे भय की प्रतिक्रिया थी, मातृ स्‍नेह था या स्‍त्री की असुरक्षा.....पड़ताल जारी है.....

(।)
बिटिया
मत जन्‍मो तुम...
मत जन्‍मो
कि
यहां कुछ भी नहीं है तुम्‍हारा....
सब धरती..
सारा आसमान....
सारे पे‍ड़....
ये सारा जहान...
कुछ भी नहीं है तुम्‍हारा बिटिया....
न ये सड़क...
न ये घर...
न ये स्‍कूल...
न ये दफ़्तर...
न ये पेड़...
न ये सूरज....
न ये चांद...
न ये तारे...
कुछ भी नहीं है तुम्‍हारा बिटिया...
न ये धूप....
न ये बारिश...
न ये धर्म....
न ये देश...
न ये संस्‍कृति...
न ये शिक्षा...
कुछ भी नहीं है तुम्‍हारा बिटिया....।

(2)
चन्‍द लोगों के घर सुख पाओगी
तुम बिटिया...
वो सुख
जो भिखारी को फेंके गए रोटी के टुकड़े सा है
इस घर से उस घर तक
ख़ानाबदोशों सी
ढू़ंढोगी तुम अपना घर....
अपने घर का सुकून...
मगर नहीं....
कहीं कुछ भी नहीं है तुम्‍हारा बिटिया....
या तो इस घर आने के लिए...
या तो उस घर जाने के‍ लिए....
बिस्‍तर पर बिछने वाली एक चादर सा है...
रहेगा अस्तित्‍व तुम्‍हारा....
जिसे बेटवा/आदमी
तब इस्‍तेमाल करता है जब खाली होता है
जब वक्‍़त नहीं कटता है....

(3)
बादल सा दु:ख
और
बारिश सा आंसू
साथ रखोगी तुम
दिये की बाती सी जलोगी...
तुम्‍हारी कोई पहचान नहीं रहने देगी
बिटिया से बुढि़या बनी औरत...
बिटिया मत जनमो तुम....
कि
तुम्‍हारे जन्‍म के लिए
तुम्‍हारी मां बनी बिटिया को
जीने नहीं देगी
बिटिया से बुढि़या बनी औरत....
बिटिया मत जनमो तुम....
कि
तुम्‍हें जलाने के लिए खरीदा जाएगा
एक दूल्‍हा...
बिटिया,
उस दूल्‍हे के बिना कोई पहचान
नहीं है तुम्‍हारी....।

(4)
बिटिया
मत जन्‍मो
बात मानो...
चाहे हम बना लें कंप्‍यूटर
ईजाद कर लें क्‍लोनिंग
बच्‍चे के जन्‍म के लिए
खरीदें कोख....
मगर
उस कोख से ‘बिटिया’ का जन्‍म नहीं चाहेंगे...
बिटिया
मत जन्‍मो तुम
तुम्‍हें कुछ नहीं मिलेगा
मुट्ठी भर राख के सिवा...
इसी मुट्ठी भर राख से एक चुटकी
सिंदूर देकर
तुम्‍हें ख़रीद लिया जाएगा...
और उस लाल रंग को
आग बना कर सजा दिया जाएगा
’मांग’ बनी तुम्‍हारी मांग में...
और
सब कुछ देकर भी तुम मांगती ही रह जाओगी...
रीते हाथ....
बिटिया मत जन्‍मो तुम...
जहां हो
वहीं सुखी रहो
दु:ख बीनने मत आओ यहां
बिटिया....।


अनुजा
02.08.1997

उससे मिलने के बाद.....

(1)
बरसों बाद मिली एक  स्‍त्री...
उसने चुना था....
घर......
पति....
बच्‍चे.....
और
एक हरियाली दुनिया....
और
छोड़ी थी उसने
इस संसार के लिए.....
अपनी सबसे खूबसूरत ख्‍वाहिश.....
और
अपने सबसे मीठे और सुरीले गले का साथ.....।

(2)
एक स्‍त्री रम गयी है
जि़न्‍दगी के उस सुहाने सफ़र में.....
जो उसने चुना था
अपने लिए...

ख़ुश है एक स्‍त्री
कि
वह जो चाहती थी
उसने
वो पाया....

खुश है एक स्‍त्री
कि
उसने अपने को खो कर
पाया है
एक सुन्‍दर घर....
प्‍यारे से बच्‍चे....
और
लंबा इंवेस्‍टमेंट प्‍लान....
पोते-पोतियों के साथ खेलने का.....।

खुश है एक स्‍त्री
कि
इसमें कहीं भी नहीं है टकराहट
उसके अस्तित्‍व की.....
नहीं है चुनौती कोई
अपनी अस्मिता को सहेज पाने की.....
खुश है एक स्‍त्री
कि
उसने वो पाया
जो
चुना था उसने अपने लिए.....।

अनुजा
22.09.13

सोमवार, 22 जुलाई 2013

परिचय

फोटो:अज्ञात



जाते ही परिचय बदल गया ....
मित्र.....
तुमने कहा था किसी से
परिचय कराते हुए मेरा.....
उस एक पल की गरमाहट
अभी भी सुलगती है
एहसास के सन्‍नाटों में.....
गए दो बरस तो
शायद उस पल की राह थे......

ये पल भी बस पल है.....
जि़न्‍दगी भर
क्‍या रहता है कुछ...

अनुजा
17.12.11


मंगलवार, 16 जुलाई 2013

कौन हूं मैं........


दफ्तर में लोग मैडम कहते हैं....
किसी के लिए दीदी हूं....
किसी के लिए दोस्‍त हूं....

अपनों के लिए प्‍यार हूं....
दुखिया के लिए आवाज़....

दुनिया के लिए संवेदना भी हूं.....
जिज्ञासा भी....
सवाल भी....

किसी के लिए बेबाकी हूं...
किसी के लिए संयम....

तुम्‍हारे लिए प्रेम हूं....
उसके लिए याद....

अपने अपने रंग हैं और अपनी अपनी नज़र....

जि़न्‍दगी के लिए राही हूं....
अलमस्‍त....हरफनमौला...

अपने लिए......
जूझने और बार-बार उठ खड़े होने की ताकत....
अनुभव और सबक के साथ....।

तुम तय करो अपना.....
माप अपनी नज़र का ताप.....
अपना उल्‍लास...
या 
अभिशाप....

दरिया की कोई मौज....
बादल का एक टुकड़ा....
बारिश की  एक बूंद ....
हवा का एक आवारा झोंका....
रास्‍ते का एक पत्‍थर.....
या
पत्‍थर का एक रेशमी टुकड़ा....

ओ आकाश 
तुम्‍हारी सरगोशियां क्‍या कहती हैं......
हवाओं 
खामोशी के कान में फूंका है तुमने 
कौन सा मंत्र.....
क्‍या बताया है मेरा पता.....

धूप 
तुम ही कहो 
चुप न रहो
कि 
जान सकूं मैं.....
कि 
कौन हूं मैं
कि
समझ आए अपना एक और रंग.....
धूप-छांही....
मोरपंखी....
राख-राख वैराग्‍य....
या फिर....
जो भी है जिसकी नज़र।

अपनी तलाश में हूं......
मैं
अग्निगर्भा अमृता....।
अनुजा
16.07.13






गुरुवार, 4 अक्तूबर 2012


आज की सुबह....
सुनहरी सुबह.....
सिंदूरी पूरब....
चांदी सा पच्छिम.....
डूबते हुए भी चमकते
हुलसते...
मुस्‍कराते चांद की सुबह.....
आसमानी आंचल पर
सिंदूरी रेखाओं के बीच
झिलमिलाते सितारों की टिमटिमाती रौशनियां....
सिंदूरी प्राची
सपनीले धनक के पच्छिम..
और
दो दिशाओं के बीच.....
दो पंछी
एक मैं.....
उम्‍मीदों की सुबह
और गर्वीले चमकीले अंत के साथ....।

अनुजा
02.10.12

पांचवां रास्‍ता....।

मुक्ति की एक सख्‍़त सुबह

पराधीनता की पीड़ा से भरे
कोमल बिछौने से ज्‍यादा सुख़द है...
सुन्‍दर है....

मैं छू पाती हूं
सुनहरी सुबह की रक्तिम लकीरें...
डूबते चमकीले चांद की लुनाई...
कतार दर कतार ओढ़नी सी उड़ती

परिन्‍दों की पांतें....

नए रास्‍तों को तलाशने का उत्‍साह और उजास....
भर पाती हूं लंबी गहरी सांसें
संभाल पाती हूं प्राणों में प्राण वायु....।

क्‍या हुआ....

जो शुरू होगा
चुनौतियों का नया सफ़र....

बांज के नीचे बहते सोते
का ठंडा जल अब होगा
मेरा अंजुरियों में......

लगता होगा उन्‍हें
कि
चुक गया मेरा आसमान...

पर
मेरे हाथ में है.....
चांद का पश्‍मीना....
धूप की चादर....
हवाओं की ओढ़नी......
पेड़ों की सरगोशियां....
पंछियों की छुन छुन की
रेशमी गुनगुनाहट....

मुक्ति का उत्‍सव है......
संघर्ष.....
संघर्ष देता है प्रेरणा.....
चौराहे पर बनाने के लिए कोई एक पांचवा रास्‍ता.....।

अनुजा
02.10.12

बुधवार, 22 अगस्त 2012

हर बार
हारने का शाप
मुझे ही क्‍यों देती है
मां गांधारी.....
मैं
जो हर बार
रचता हूं एक नई गीता
बनाता हूं
एक नया अर्जुन....
करता हूं
पांचजन्‍य का उद्घोष.....
कहता हूं
लड़़ने के लिए स्थितप्रज्ञ हो.....
आज मैं क्‍यों कमज़ोर पड़ता जा रहा हूं.....
क्‍यों खींचते हैं
आज मेरे हाथों को
गोपिकाओं के आंचल.....
क्‍यों बुलाती है
राधा की
रंगीली बांसुरी....
क्‍यों अकुलाती है
यशोदा की ममता....
क्‍यों.....।

अनुजा
26.12.1996

क्‍यों.....

क्‍यों चाहते हो
कि
सरक जाए
मेरे
मोहासक्‍त हाथ से
कर्त्‍तव्‍य का गांडीव.....
क्‍यों चाहते होकि

रचना हो एक बार फिर
किसी गीता की....
जीवन के इस महाभारत में......
अनुजा
26.02.96


मंगलवार, 10 अप्रैल 2012

चल हंसा......

जब उनके पास नहीं था कोई रूप रंग....
कोई आकार....
कोई चेहरा....
कोई पहचान....
उन्‍होंने चुना एक माली को.....
एक कुम्‍हार को.....
एक दर्जी़ को...
एक मिस्‍त्री को.....
एक कामगार को....
एक बुद्धिजीवी को.....
एक मां को....
एक औरत को....
एक टीचर को.....
एक निर्माता को....
रोका एक राही को.....
स्‍वागत किया सबका....

आज...
जब तैयार हो गया है उनका घर....
हो चुका है रंग रोगन....
आ चुका है दुनिया की नज़र में....
वो नहीं चाहते
कि वहां रूके एक पल भी वो....
उन्‍होंने तय कर दी हैं....
उनकी दिशाएं...
उनकी सीमाएं....
उनकी जि़म्‍मेदारियां....
उनकी भूमिकाएं....
उनका लक्ष्‍य.....

खींच दी है
एक लक्ष्‍मणरेखा....
ख़त्‍म करने को तैयार हैं उनका अस्तित्‍व....
ताबूत में बस आखिरी कील जड़नी बाक़ी है....

न जाने वो पल कौन सा होगा.....
किस झोंके के साथ आएगा.....
कहां ले जाएगा.....

कुछ भी नहीं पता....
बस दूर तक फैले सन्‍नाटे में....
उड़ती हुई रेत में....
फैली...बिखरी..धंसी....उभरी...हुई चट्टानों में...

सूखते पत्‍तों के कांपते हुए होठों को
पैरों से चूमते हुए.....
रौंदते हुए रेत के ढेर को.....

जाना है कहीं दूर....
किसी दिशा में....
तैयार है.... सब कुछ....

चल हंसा....
उस देस, जहां.....
उड़ते हों बादल....

खिलती हो धूप....
बहते हों झर झर झरने....

नाचती हो जीवन की उमंग....
बचपन का भोलापन.....
चल हंसा....!

-अनुजा
10.04.12