शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2007

संघर्ष की परंपरा का स्‍तंभ है लिखना और लड़ना- बेबी हालदार

प्रेमचंद्र के नाती प्रबोध कुमार ने भले ही हिन्‍दी साहित्‍य को अपनी रचना के जरिये अवदान नहीं दिया लेकिन उन्‍होंने रचनाकार तैयार किया है,वह भी विश्‍वविख्‍यात। उन्‍होंने अपने घर में सातवीं पास सेविका बेबी हालदार को लेखिका बना दिया। हालदार की आत्‍मकथा 'आलो आंधारि' का साहित्‍य जगत में जोरदार स्‍वागत हुआ। वह निरंतर रचनारत हैं। 'दि संडे पोस्‍ट' संवाददाता अजय प्रकाश ने दर्जनों भाषाओं में छप चुकी 'आलो आंधारि' की लेखिका बेबी हालदार से बातचीत की। पेश है उसके अंश :

कम समय में आपने बतौर लेखिका ख्‍याति हासिल कर ली, भविष्‍य की क्‍या योजनायें हैं।
मेरी भविष्‍य की योजना सीखने की है-अपने समाज से, शागिर्दों से। सच कहा जाये तो अभी तो मैंने समाज को लेखक की आंखों से देखने की शुरूआत भर की है। 'आलो आंधारि' लिखने के बाद मैंने महसूस किया कि उसमें वह बाकी रह गया जो उसे और उत्‍कृष्‍ट बना सकता था। इसलिये मैं अपनी पिछली किताब से सबक लेकर अगली किताब लिख रही हूं। लगभग तैयार हो चुके इस उपन्‍यास का नाम अभी तय नहीं हो पाया है। इसे भी रोशनाई प्रकाशन ही प्रकाशित कर रहा है।
किन उपन्‍यासकारों ने आपको 'काम वाली बाई' से 'आलो आंधारि' की बेबी हालदार बना दिया। लेखिका तसलीमा नसरीन का उपन्‍यास 'मेरा बचपन' पढकर मेरे सामने अपनी जिंदगी की कथा जीवंत हो उठी थी। मैंने महसूस किया कि ऐसी कथा तो मेरी भी है, मैं लिख सकती हूं और फिर लिख डाला। आज 'आले आंधारि' हिन्‍दी, अंग्रेजी, बांग्‍ला, कोरियाई समेत कई भाषाओं में छप चुकी है या छपने को तैयार है।
एक नौकरानी को तसलीमा कैसे मिली।
मैं बेहतर जीवन की तलाश में पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर से दिल्‍ली आयी थी। वर्ष 2000 में प्रबोध जी के यहां काम करने के वे शुरूआती दिन थे। मैं किताबों के आसपास जमीं गर्द को झाड़ते हुए बांग्‍ला भाषा की पुस्‍‍तकों को पलट लेती थी। कई बार मुझे किताब की अलमारी के पास देर भी हो जाती थी। किन्‍तु किताबों के लिए कभी तातुस (स्‍पेनिश में पिता को कहा जाता है) ने टोका नहीं। एक दिन काग़ज़ क़लम दिया और कहा जो पढ़कर तुम सोचती हो लिखा करो। हिचकिचाहट के साथ जब लिखना शुरू किया तो तातुस ने तसलीमा का 'मेरा बचपन' पढकर नोट्स लेने की बात कही और यह भी कहा कि उसने भी आपबीती ही लिखी है। तातुस के आत्‍मीय सहयोग और सचेतन कोशिश से मुझे बल मिला। उपन्‍यासों, कहानियों के लिखने का सिलसिला तभी शुरू हो पाया।
शिक्षक, पिता या पथ प्रदर्शक आप किस रूप में तातुस को महसूस करती हैं।
इन सबसे बढ़कर वो मेरे जीवन का वह पथ हैं जिसकी बदौलत हमें नई जिजीवषा मिली है। बांग्‍ला में लिखे मेरे पन्‍नों का अनुवाद करते जाना, अनुवादों को अन्‍य लेखकों की राय के लिए पतों पर भेजना यह सारा उद्यम उन्‍होंने कुछ यूं किया मानो वो खुद ही रच रहे हों। उनके किसी भी व्‍यवहार से मुझे कभी नहीं लगा कि वह उपकार या सहानुभूति की भावना से प्रस्‍थान करते हैं।
तातुस नया क्‍या कर रहे हैं
एक नौकरानी लेखिका या कुछ और भी हो सकती जानकर लोग संपर्क उनसे संपर्क कर रहे हैं। प्रबोध जी रचनाकारों की ऐसी पीढी़ तैयार कर रहे हैं जो साहित्‍य से सदियों दूर रही है। वह सौंदर्य गहरा होगा, सच्‍चाई मारक होगी जब वे खुद लिखेंगे जो उन जीवन परिस्थितियों को जी रहे हैं।
वर्ष 2000 के पहले वाली बेबी हालदार के बारे में कुछ बताइये।
ए‍‍क ही सपना था कि जिस जकड़न और घुटन की जिंदगी जीने के लिए मैं मजबूर हूं उससे अपने बच्‍चों को उबार लूं। पति इस काबिल नहीं थे कि वह पालन कर पाते। मैंने सुना था दिल्‍ली पहुंचने पर जिंदगी थोडी़ बेहतर हो जाती है, काम वाली बाई पेट भर लेती है। बच्‍चों को लेकर मैं भाई के पास दिल्‍ली आ गई और संयोग से तातुस का घर मिल गया। मात्र कुछ महीनों में ही मैं इंसान का दर्जा पा
गयी जिससे देश के करोड़ों लोग महरूम हैं।
उन महरूमों के लिए आप क्‍या करना चाहती हैं।
कुछ वैसा ही जैसा महाश्‍वेता देवी कर रही हैं। स्त्रियों,दलितों एवं उपेक्षित तबकों के पक्ष में लेखन करना चाहती हूं जिसे वह अपना साहित्‍य कह सकें। लड़ना और लिखना संघर्ष की ही परंपरा के मजबूत स्‍तंभ हैं। कहा जा सकता है कि एक लेखक किसी एक के अभाव में एकांगी हो जाता है, अपनी जड़ों से उखड़ जाता है।

1 टिप्पणी:

  1. hie.....i like baby haaldaar....i have read all stories related to baby haaldaar i got motivated n loved the story of her...seriously tatush played a big role in baby's life.

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